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व्या꣢३꣱न्त꣡रि꣢क्षमतिर꣣न्म꣢दे꣣ सो꣡म꣢स्य रोच꣣ना꣢ । इ꣢न्द्रो꣣ य꣡दभि꣢꣯नद्व꣣ल꣢म् ॥१६४०॥

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स्वर-रहित-मन्त्र

व्या३न्तरिक्षमतिरन्मदे सोमस्य रोचना । इन्द्रो यदभिनद्वलम् ॥१६४०॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षम् । अ꣣तिरत् । म꣡दे꣢꣯ । सो꣡म꣢꣯स्य । रो꣣चना꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । यत् । अ꣡भि꣢꣯नत् । व꣣ल꣢म् ॥१६४०॥

सामवेद » - उत्तरार्चिकः » मन्त्र संख्या - 1640 | (कौथोम) 8 » 1 » 9 » 2 | (रानायाणीय) 17 » 3 » 1 » 2


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हिन्दी : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अगले मन्त्र में फिर जीवात्मा का विषय है।

पदार्थान्वयभाषाः -

(इन्द्रः) बलवान् जीवात्मा (सोमस्य) भक्तिरस के (मदे) उत्साह में(यत्) जब (वलम्) आवरण डालनेवाले अर्थात् लक्ष्य-प्राप्ति के बाधक अविद्या-अस्मिता-राग-द्वेष आदि, काम-क्रोध आदि और व्याधि-स्त्यान-संशय-प्रमाद-आलस्य आदि विघ्न-समूह को(अभिनत्) छिन्न-भिन्न कर देता है, तब (अन्तरिक्षम्) मध्यस्थ मनोमय और विज्ञानमय आकाश को तथा (रोचना) उसमें प्रकाशमन सद्भाव-रूप नक्षत्रों को (वि-अतिरत्) फैला देता है ॥२॥

भावार्थभाषाः -

परमात्मा के पास से प्राप्त बल से ही मनुष्य का आत्मा पग-पग पर आये हुए विघ्नों का विध्वंस करके लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ होता है ॥२॥

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संस्कृत : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अथ पुनरपि जीवात्मविषयमाह।

पदार्थान्वयभाषाः -

(इन्द्रः) बलवान् जीवात्मा (सोमस्य) भक्तिरसस्य (मदे) उत्साहे (यत्) यदा (वलम्) आवरकं, लक्ष्यप्राप्तौ प्रतिबन्धकम् अविद्यास्मितारागद्वेषादिकं, कामक्रोधादिकं, व्याधिस्त्यानसंशय- प्रमादालस्यादिकं च विघ्नसमूहम् (अभिनत्) भिनत्ति तदा (अन्तरिक्षम्) मध्यस्थं मनोमयं विज्ञानमयं च आकाशम्, तत्र च(रोचना) रोचनानि तेजोमयानि सद्भावरूपाणि नक्षत्राणि(वि-अतिरत्) विस्तारयति ॥२॥

भावार्थभाषाः -

परमात्मनः सकाशात् प्राप्तेन बलेनैव मनुष्यस्यात्मा पदे पदे समागतान् विघ्नान् विध्वस्य लक्ष्यं प्राप्तुं क्षमते ॥२॥